क्या सोरायसिस जानलेवा बीमारी है?HealthPlanet

Posted on Mon 5th Dec 2022 : 11:46

चर्म रोग विशेषज्ञ डा. रुचि पटवर्धन का कहना है कि स्टेट सोरायसिस को आमतौर पर लोग पहचान ही नहीं पाते हैं। इसे लोग खुश्की के तौर पर ही लेते हैं, लेकिन ये बीमारी आनुवांशिक लक्षणों पर भी असर डालती है। यदि इसका इलाज वक्त पर न हो तो इससे मौत तक हो सकती है।

सोराइसिस यानी जानलेवा चर्मरोग
मेडिकल साइंस में सोराइसिस एक क्रोनिक ऑटो-इम्यून स्किन डिसीस है, इसमें त्वचा की कोशिकायें (स्किन सेल्स) तेजी से बनने के कारण स्केलिंग (शल्कन) होने लगती है, जिससे त्वचा पर सूजन और लाल-सफेद चकत्ते बनते हैं, इनसे खुजली, जलन और दर्द होता है। कुछ समय बाद इन पर सूखी पपड़िया बन जाती हैं। ये चकत्ते शरीर में एक स्थान पर एक महीने या इससे ज्यादा रहते हैं, ठीक होने के बाद फिर से किसी दूसरे स्थान पर उभर आते हैं। स्किन सेल्स का जीवन चक्र एक महीने का होता है। सामान्य प्रक्रिया में स्किन सेल्स को स्किन में गहराई की ओर बढ़ना चाहिये लेकिन सोराइसिस की वजह से इनके सतह पर बढ़ने के कारण पपड़ियां बन जाती हैं। सोराइसिस से स्किन सेल्स अति-उत्पादन की प्रक्रिया तेजी से कुछ दिनों या महीनों चलती रहती है। ज्यादातर मरीजों में सोराइसिस के चकत्ते जोड़ों (कोहनी और घुटने) पर उभरते हैं, लेकिन ये शरीर में कहीं भी उभर सकते हैं जैसेकि हाथ, पैर, गले, खोपड़ी या चेहरे।

दुर्ल मामलों में यह रोग नाखून, मुंह और जननांगों में भी होता है। डायबिटीज 2, इन्फ्लेमेटरी बॉउल डिसीस, हार्ट डिसीस, सोराइटिक गठिया, एंग्जॉयटी और डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों को सोराइसिस होने के चांस अधिक होते हैं। हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके एक करोड़ से ज्यादा मामले सामने आते हैं, यह बीमारी पूरी तरह से ठीक नहीं होती लेकिन दवाओं, खानपान और लाइफस्टाइल परिवर्तन से इसे कंट्रोल करके सामान्य जीवन जी सकते हैं।

क्यों होता है सोराइसिस?

सोराइसिस का मूल कारण इम्यून सिस्टम बिगड़ना है। इसमें खून में मौजूद टी सेल्स अपनी त्वचा को बाहरी तत्व समझकर उसे नष्ट करने लगते हैं तो त्वचा में सूजन आने से वह लाल रंग की हो जाती है, इससे बचने के लिये शरीर, त्वचा के सेल्स का ओवर प्रोडक्शन करता है जिससे नये स्किन सेल्स तेजी से बनते हैं और ये त्वचा पर पपड़ी के रूप में जम जाते हैं।

कुछ मामलों में यह जेनेटिक होती है, यदि परिवार में कभी भी किसी को सोराइसिस हुआ है तो यह नजदीकी फैमिली मेम्बर को भी हो सकता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अनुसार सोराइसिस के 2 से 3 प्रतिशत मरीज जेनेटिक होते हैं।

बहुत से मामलों में कुछ अन्य कारण भी सोराइसिस को सक्रिय (ट्रिगर) करते हैं, मेडिकल लैंग्वेज में इन्हें सोराइसिस ट्रिगरर्स कहा जाता है। इनमें सबसे कॉमन है स्ट्रेस या तनाव। यदि व्यक्ति लम्बे समय से तनाव में हैं तो वह कभी भी सोराइसिस का शिकार हो सकता है। धूम्रपान और ज्यादा मात्रा में शराब पीना इसे ट्रिगर करता है, इससे सोराइसिस बार-बार उभरती है। ऐसे में सोराइसिस शांत करने के लिये स्मोकिंग और शराब छोड़ना सबसे अच्छा उपाय है। इनके अलावा चोट, त्वचा पर लगा जख्म, संक्रमण, सनबर्न, किसी वैक्सीन का शॉट और हाई बल्ड प्रेशर, लीथियम व एंटी-मलेरियल दवाएं भी सोराइसिस को ट्रिगर करती है।

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